Monday, 12 September 2016

Hadsar to manimahesh हड़सर से मणिमहेश और वापसी भाग -2

मणिमहेश यात्रा भाग -2
हड़सर से मणिमहेश और वापसी hadsar to manimahesh trip
देखने में ही अच्छा लगता है जब इसपे चलते है तो पूछो मत -

  अगले दिन सुबह एक झटके से नींद खुली और सीधा टाइम देखा अरे ये क्या 6:30 हो गए, लेकिन कैसे ?? फिर पता लगा योगेश ने अलार्म बन्द कर दिया था क्योंकि उसको जल्दी उठना पसंद नहीं है,  उसकी इस हरकत की वजह से हम काफी लेट हो गए , अब हमें समय बचाना था तो जल्दी जल्दी करके 7:15 पे निकल गए नास्ता किया और यात्रा चालू की लेकिन यात्रा पे निकलते ही बारिश चालू हो गयी जो हमारी यात्रा की सबसे बड़ी परेशानी थी या ऐसे बोलू की हर पहाड़ी यात्रा की सबसे बड़ी परेशानी बारिश हो जाती है अब यात्रा तो करनी है सो भोले बाबा का नाम लेके पोंचू पहन के यात्रा चालू कर दी। 

पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ देखे   
MANIMAHESH YATRA PART-1

            थोड़ी देर चलने के बाद ही हमे अहसास हो गया था कि यात्रा आसान नहीं रहेगी, क्योंकि जो भी वापस आया सबने बताया कि रास्ता बहुत ख़राब हो गया है। 14 किमी का रास्ता अब बढ़कर 18 -19 किमी का हो गया था।  नीचे का रास्ता बादल फटने की वजह से बह गया था और ऊपर का रास्ता बहुत मुश्किल था, ऊपर से बारिश की वजह से फिशलन बाप रे बाप हालात खराब हो गयी थी, योगेश तो बहुत सुस्त हो गया था धीरे धीरे करके हम ऊपर चढ़ रहे थे. ये फालतू की चढ़ाई  हौसला तोड़ रही थी, जिसके वजह से हमे तक़रीबन 4 किमी ज्यादा चलना पड़ा वो भी सीधी खड़ी चढ़ाई पे तो हालात तो ख़राब हो गये , रास्ता ऐसा था मानो अभी गिरे - अभी गिरे, बादल की वजह से जिस रस्ते पे जाना पड़ा वो बिलकुल भी अच्छा नहीं था निचे वाला रास्ता अच्छा था और छोटा भी पर उसमे 300 मीटर का कट हो गया था,  तो उसे बंद  कर दिया गया  । अब इस रस्ते में बहुत जगह कीचड़ और ऊपर से सीधी खड़ी चढ़ाई और वो भी घने जंगल में, पुरे रस्ते में कही पैर सीधा करने की जगह नहीं थी , कसम से किनर कैलाश की याद आगयी, पर वहाँ बारिश नहीं थी तो बचत थी यहाँ बारिश ने हालात बतर बना दिए थे।  जैसे तैसे करके ऊपर वाले रास्ते से होते हुए हम नीचे आ गये निचे आने पे हम एक ढाबे पे रुके और वहाँ कल वाले गुजरती थेपले और दही जो की हम सुबह साथ लाये थे खा लिया जैसे ही पेट में कुछ गया शरीर में जान आ गयी अब वापस लगा की आज यात्रा कर ही लेंगे
हालात देखो रस्ते की एक आदमी भी चल नहीं सकता यही बादल फटा था

   7 -8  थेपलो का नास्ता करने के बाद हम आगे बढे , बारिश की वजह से ठण्ड बहुत ज्यादा हो गयी और तेज़ हवा भी चल रही थी, बारिश की बुँदे हवा के साथ सीधे मुँह पे.... बेचारा मेरा चेहरा तो मुझे गालिया ही दे रहा था पहले ही उसपे में इतना अत्याचार कर चूका हु, पहाड़ी यात्रयों पे हर बार एक जग लड़के जाना होता है और उसमे सबसे ज्यादा टाइम फेस को ही लगता है रिकवर होने में, पर इस कम्भख्त दिल को कोण समझाये, उसको तो यही आना अच्छा लगता है, ये तो किसी भी हालात में इन कठिन रास्तो से ही प्यार करेगा ।...... धीरे धीरे हम आगे बढे, फिर सामने सबसे ठंडी जगह आ गयी, जहा मणि महेश नाला हमे पार करना था, एक तो बारिश ऊपर से नाले में बहुत ज्यादा पानी पूल तक पानी की लहरे आ रही थी उस पूल की हालत भी ज्यादा ठीक नहीं थी , लेकिन पार तो करना ही था सो चल दिए धीरे धीरे डरते डरते और हो गया पार। फिर आगे वापस चढ़ाई चालू होनी थी और काफी खतरनाक चढ़ाई उस चढ़ाई का सबसे मुश्किल पहलु वो पानी था जो बारिश की वजह से ऊपर से आरहा था ऊपर से सारे रस्ते पे पत्थर,  उन पत्थरो पे फिशलन का डर,  एक और नयी समस्या जैसे जैसे आगे बढ़ते गए योगेश भाई की हालात ख़राब होती गई। भाई को होंसला देदेके आगे बढ़ाया चढ़ाई बहुत ही कठिन ऊपर से घना जंगल अब तो सोचने में ही डरावना लग रहा है उस समय पता नहीं क्या हालात रही होंगी। उस रस्ते पे कुछ दूर चलने के बाद हमे एक आदमी मिला जो की हमारे पीछे से आया था, वही एक आदमी पुरे रस्ते में हम से एक बार आगे निकल सका था, वो भी कुछ देर के लिए।  वो काँगड़ा के पास का था और उसका परिवार आगे जा चूका था, तो वो उनसे मिलने के लिए जल्दी जल्दी चल रहा था उसने बताया की उसके साथ 11 महिलाये वे 1 बच्चा है और वो आदमी  पिछले 7-8 साल से मणि महेश यात्रा पे आता है उसने बताया की उसकी माँ भी आयी है यात्रा पे, अब  उस आदमी की उम्र काम से काम 45-50 साल होगी तो माँ की कितनी होगी ??? यही सोच के हमे होंसला मिला और हम ने भी गति पकड़ी। उसी होंसले ने हमे धन्छो तक पहुंचा दिया, धन्छो से पहले उनका सारा परिवार हमे एक ढांबे पे मिला जहाँ वो लोग चाय पि रहे थे, उन्होंने हमे चाय के लिए पूछा वैसे तो मुझे चाय बहुत पसंद है, लेकिन उस टाइम बिलकुल भी मन नहीं था तो हमने मना कर दिया पर हम उनके पास रुक गए, बहुत अच्छा परिवार था  उस बच्चे की उम्र सिर्फ 6 -7 साल थी पर हौसला काबिले तारीफ था और माता जी 76  साल के थे, यही पहाड़ी लोगो की सबसे अच्छी बात है की वो कभी होसंला नहीं छोड़ते, हमेशा संघर्ष में विशवास रखते है, और जल्दी से हार नहीं मानते। खेर उन्होंने मणि महेश भी रात रुकना था और हमे वापस आना था तो हम लोगो ने कुछ देर बाते करके विदा ली और धन्छो के लिए बढ़ लिए, धन्छो में पहुँचते ही सबसे पहला काम जिसको बहुत जरुरत थी वो किया। मोमोज़ खाये खूब सारे बड़े ही स्वादिस्ट थे वो मोमोज़, तब तक बारिश थोड़ी धीमी हो गयी तो हमने कुछ देर आराम करके आगे बढ़ने का फैसला किया, अब समय होगया था लगभग 11.30 बजे का। 

manimahesh kailash yatra marg map

                     धन्छो से आगे की यात्रा के लिए 2 मार्ग है एक तो सीधी चढ़ाई वाला वांदर घाटी मार्ग है दूसरा थोड़ी काम सीधी चढ़ाई वाला फहरा मार्ग है, और दोनों रास्तो पे ही लोग जाते है, तो हमने ढाबे वाले से ही पूछा की कोनसे रस्ते से जाना सही रहेगा, उसने हमे वांदर घाटी का मार्ग बताया जो सबसे मुश्किल रास्ता था।  एक दम खड़ी चढ़ाई ऊपर से बारिश की वजह से फिशलन, लेकिन दूसरे मार्ग में भी परेशानिया काम ना थी उस रस्ते पे 4-5 जगह मलबा गिरा हुआ था और वो 2 किमी ज्यादा लंबा भी था, तो हम वांदर घाटी वाले रस्ते पे निकल लिए। थोड़ी दूर चलते ही योगेश भाई की हालत तो ख़राब होने लगी, सिर दर्द होने लगा और चला भी नहीं जा रहा था, और उस रस्ते पे कही खड़े रहने की भी जगह नहीं थी हवा तो इतनी तेज़ थी की थोड़ी से लापरवाही और हमे गिरे, ऊपर से थोड़ी थोड़ी ठंडी ठंडी बारिश की बुँदे, बहुत ही मुश्किल यात्रा हो गयी ये। योगेश भाई ने वांदर घाटी के आधे रस्ते में जा के जबाब दे दिया अब मुझसे  आगे नहीं जाया जा सकेगा, लो भई अब फस गये हम तो , ना आगे जा पा रहे थे न पीछे जाने की हिमत थी सो थोड़ी देर रुके टॉफी खायी और थोड़ा भगवन ने भी साथ दिया हवा और बारिश दोनों रुक गए तो मैंने योगेश को समझाया की पीछे जाने में कोई फायदा नहीं है, आपको आगे कही किसी ढाबे पे बैठा देता हु और मैं अकेला ही जाके वापस आते समय आपको निचे ले जायूँगा तो वो मान गया हम कुछ देर और चलने के बाद दूसरे मार्ग के संगम पे पहुँच गए वहा 2 ढाबे भी थे जिनमे से एक में जाके हम रुक गए, वहा सबसे पहले हमने ज्यूस लेके पिया, आपने तो सीधा सिस्टम है जैसे ही पेट में कुछ जाता है जान में जान आजाती है फिर कही भी ले जायो बस खाली पेट कुछ नहीं कर पाता। सो योगेश को थेपले खिला के वही छोड़ दिया और मैं खा के अकेला ही आगे बढ़ गया। योगेश को दवाई खिला के बोल दिया था की मैं आज ही जरूर वापस आयुंगा, अगर मॊसम ज्यादा ख़राब हुआ और मैं किसी हालात में आज वापस न आ पाया तो कही जाना नहीं, मैं वही आयुंगा चाहे अगला दिन हो जाये। मेरे बिना अकेले वापस नहीं जाना मैं तुझे अपने साथ निचे लेके जायूँगा।  समय लगभग १ बजे का था।
ये रास्ता वांदर घाटी वाला है

मैंने आगे की यात्रा चालू की अब मैं अकेला था तो थोड़ा तेज़ चल सकता था।  मैंने आने स्पीड खीच ली और सबसे आगे निकल गया।  लगभग 5  किमी चलने के बाद फिर 2 रस्ते आगये।  यहाँ मैं अकेला ही था और कोई भी नहीं था बस बहुत सारे बादल जिनकी वजह से रास्ता साफ़ नहीं दिख रहा था तो मैंने निचे वाला रास्ता चुना भैरो घाटी के निचे वाला जो की किसी ने बताया था की छोटा है ये सारा इलाका क्रेवास वाला  लगभग 1 किमी का रास्ता ऐसे ही था, पत्थरो के गिरने की आवाज डरा रही थी कही किसी पत्थर के निचे न आजायु यही सोच सोच के आगे बढ़ रहा था अकेला था तो थोड़ा ज्यादा डर लग रहा था और यात्रा में डर का एक ही इलाज़ है,  बम  बम  भोले, जय भोले , यही जोर जोर से बोलता मैं आगे बढ़ रहा था,
भैरो घाटी में क्रेवास वाला इलाका
                     आगे एक झरना आया जहा एक कुत्ता खड़ा था, सच में उसको देख के बहुत अच्छा लगा जैसे कोई साथी मिल गया हो थोडे से बिस्कूट खिला के उसको साथ कर लिया पर झरने को पार करने के चकर में मैं पूरा भीग गया, यहाँ से मुश्किल रास्ता चालू हो गया था गोरी कुंड तक पत्थरो को हाथ से पकड़ पकड़ के चलना पढ़ रहा था और वो कुत्ता भी उसी रस्ते मेरे साथ चलता आरहा था उस चढ़ाई को  पार करने के बाद गोरी कुंड आगया जहा काफी दुकाने और होटल है वही से मैंने एक मूंगफली का पैकेट ले लिया और एक बिस्कूट पैकेट आपने उस साथी कुते  को खिला दिया, यहाँ से मणिमहेश झील थोड़ी ही बची थी सो जल्दी करना लाज़मी था समय लगभग 2  बजे गए थे. 
गोरी कुंड में मणिमहेश  रास्ता
             गोरी कुंड से आगे सीधी खड़ी चढ़ाई थी लेकिन थोड़ी थी तो हौसला हो गया की आज वापस जा पाएंगे ऊपर से मॊसम भी ठीक हो गया था।  जैसे ही कुछ आगे बढ़ा एक आश्चर्चय सामने दिखाई दिया, उस को देख के मैं बहुत खुश हो गया और वो था योगेश भाई।  लेकिन कैसे वो यहाँ कैसे ???? मैं इतना तेज़ी से आया फिर ये यहाँ पे कैसे आगया, अब उसकी तबियत भी ठीक लग रही थी, उसने बताया की उसे घोडा मिल गया है जो आने जाने के लिए उसने बुक कर लिया और मेरे संगम से निकलते ही वो निकल गए थे और वो ऊपर वाले रस्ते से आये तो वो  मेरे बराबर ही पहुँच गए। अब हम मिलके मणिमहेश के दर्शन कर पाएंगे यही सोच के मैं खुश था, भाई तो घोड़े पे ही आगे चला और मैं पदैल लगभग बराबर ही झील पे पहुँच गए यहाँ से मणिमहेश कैलाश के दर्शन करके दिल धन-धन हो गया सबसे पहले पूजा की फिर प्रसाद खा लिया बहुत भूख लगी थी लेकिन उस जगह की शांति ने पेट भर दिया बहुत ही सुकून वाली जगह भी, ठण्ड बहुत थी तो बहुत देर नहीं रुक सकते थे और योगश भाई को ठण्ड भी ज्यादा लग रहे थी तो हमने मैग्गी का आर्डर कर दिया। वैसे किसी भाई ने सही कहा है घुमाकड़ो के लिए मैग्गी ही सबसे अच्छा खाना है जल्दी से बन जाती है और जल्दी से खा भी सकते हो, मैग्गी खाते ही हम वापसी के लिए चल दिए।
         योगेश भाई तो घोड़े पे जाने वाले थे सो उनके साथ गोरी कुण्ड तक आया, फिर मैंने दूसरा रास्ता ले लिया शायद इसका मार्ग का नाम फहरा मार्ग था और बहुत ही कम लोग आते है इस मार्ग से,  मुझे नए रस्ते से जाना अच्छा लगता है तो उसी रस्ते को चुना और फुल स्पीड में निचे की और चल दिए बिना रुके पत्थरो के ऊपर से होते हुए धन्छो के लिए चल दिया, हमने मिलने का स्थान पहले से  निशचित कर लिया था वही मोमोज़ वाला।  रास्ता बहुत कठिन था पुरे रस्ते में पत्थर और मलबा भरा पड़ा।  ऊपर से सिर्फ एक जोड़ा मिला पुरे रस्ते में 8  किमी के।  पैरो में बहुत तकलीफ होने लग गयी थी घुटनो में दर्द और घुटने फ्री भी हो रहे थे। उस रस्ते में सिर्फ एक ढाबा जहा एक लीची जूस पिया और निचे पहुँच गया। जब मैं पहुंच तब तक योगेश नहीं आया था तो अच्छा लगा की तेज़ी कोई काम तो आयी, आते ही हाफ प्लेट मोमोज़ आर्डर कर दिया, सर्दी बहुत जायद लग रही थी और समय भी 5;3० का हो गया था तो मोमेस ही एक उमीद थी जिससे मैं सर्दी से बच सकता था, मोमोज़ खाने के बाद तक़रीबन 3० मिनट इंतज़ार के बाद भाई आया, घोड़े वाले ने मुझे देखते ही कहा की इतना जल्दी आना संभव नहीं है कैसे आये आप। ...... अब उसको क्या बताता की जब मुझे भूख लगी होती है तो मैं खाने के लिए शायद कोई रेकॉर्ड भीतोड़ सकता हु, उनको मोमोज़ खिला थोड़े खुद खा के निचे की और प्रस्थान कर लिया।  समय लगभग 6;30  का हो गया था और रात होने से पहले पहले वापस जाना था और अब घोडा भी नहीं था तो योगेश को भी साथ लेके चलना था। बिना समय गवाये वहा से निकल लिए आगे ढलान भी और मेरे पैरो में छाले भी हो गए थे लेकिन रात होने के डर से हम बिना रुके तेज़ी से निचे की और बढे। अब समस्या उसी पूल से आगे की थी.......  वो जंगल वाला रास्ता और चढ़ाई, वहाँ जाके तो तो हालात ख़राब हो गए, एक दम सुस्त लगभग 30 किमी की यात्रा कर चुके थे तो मुश्किल होनी ही थी ऊपर से मॊसम और चढ़ाई ने हालात और ख़राब कर रखे थे, हम धीरे धीरे निचे बढ़ रहे थे या यु कहे की निचे की चढ़ाई चढ़ रहे थे थोड़ी चढ़ने के बाद फिर ढलान आगयी और हमने उनको भी पार कर लिया और मणि महेश नाले के पास पहुँच गए यहाँ हमे कुछ लोग भी मिल गए, जो की कल यात्रा पे आये थे और वापसी कर रहे थे, जब उनको पता लगा हम आज ही जाके वापस आये है तो उन्होंने हमे सलूट किया, हमे बड़ा अच्छा लगा,  अब तक रात हो गयी थी और आगे फिर से जंगल आने वाला था अंतिम 1.5 किमी का, घना जंगल और खायी ऊपर से फुल अँधेरा, मैंने अपना मोबाइल निकल के आगे वाले बेग में टांग दिया जो की बढ़िया टोर्च का काम कर रहा था। वहा से दूर एक रौशनी दिखाई दे रही थी हड़सर की, उसी रौशनी की उमीद ने हमे जैसे तैसे हड़सर पहुंच दिया।  होटल वाला, ढाबे वाला सब हमको देख के आश्चर्यचंकित हो रहे थे की एक दिन में कैसे यात्रा कर ली। हमे बड़ा अच्छा लग रहा था निचे आके, सबसे पहले सामान लिया और बाइक उठा के वहा से निकल गए भरमौर के लिए , भरमौर अच्छा खाना और अच्छा रहना मिलेगा यही सोच हमे हिमत दे रही थी।  भरमौर पहुँच के फोजी गेस्ट हाउस में कमरा लिया 400 रु में और फिर बढ़िया खाना  खाया बस स्टैंड पे रात के लगभग 11  बज गए, फिर हम सो गए सुबह जल्दी नहीं की आराम से 7 बजे निकले नहा-धो के, वहा से बनीखेत तक साथ आये फिर मैं पठानकोट के लिए बस पे निकल गया भाई आपने घर के लिए, पठानकोट से मैंने ट्रैन रात को ही बुक करवा ली थी तो अगले दिन सुबह आराम से दिल्ली पहुँच गया। 
              यही थी हमारी मणि महेश यात्रा -

कुल खर्च यात्रा में बनीखेत से बनीखेत तक - ११ ०० रु 
समय दिल्ली से दिल्ली तक - 3  दिन 4  रात
यात्रा समय - ७ सितबर से १० सितंबर
रूट - दिल्ली से चम्बा वाया बनीखेत , चम्बा से हड़सर वाया भरमौर 
पैदल यात्रा - लगभग ३४ किमी (२८ किमी है )
यात्रा के कुछ चुनींदा फोटो -